पदनाम नहीं, वास्तविक कार्य तय करेगा “कामगार” की पहचान
— सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय (Srinibas Goradia बनाम Arvind Kumar Sahu, 2025)
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया है कि किसी कर्मचारी को Industrial Disputes Act, 1947 के अंतर्गत “कामगार” माना जाएगा या नहीं, इसका निर्धारण उसके पदनाम (Designation) से नहीं बल्कि उसके द्वारा किए जाने वाले वास्तविक और प्रमुख कार्य (Actual / Dominant Duties) से होगा। यह निर्णय Srinibas Goradia बनाम Arvind Kumar Sahu एवं अन्य मामले में दिया गया, जो श्रम कानून के क्षेत्र में दूरगामी प्रभाव डालने वाला है।
इस मामले की पृष्ठभूमि यह थी कि अपीलकर्ता श्री Srinibas Goradia एक होटल में कैशियर के रूप में कार्यरत थे। उन्होंने कई वर्षों तक सेवा दी, किंतु बाद में उनका वेतन बंद करते हुए उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। इसके विरुद्ध उन्होंने श्रम न्यायालय में यह कहते हुए विवाद उठाया कि उनकी सेवा अवैध रूप से समाप्त की गई है और वे Industrial Disputes Act के अंतर्गत “कामगार” हैं।
श्रम न्यायालय ने यह माना कि होटल एक “उद्योग” है और अपीलकर्ता द्वारा किया जाने वाला कार्य मुख्यतः लिपकीय और कैशियर जैसा था। इसलिए उन्हें “कामगार” माना गया और उनकी सेवा समाप्ति को अवैध ठहराते हुए पुनः नियुक्ति तथा Back Wages (पिछला वेतन) देने का आदेश दिया गया।
हालांकि, उच्च न्यायालय ने इस निर्णय को पलटते हुए यह कहा कि अपीलकर्ता supervisory/managerial प्रकृति का कार्य करता था, इसलिए वह “कामगार” नहीं है।
मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पहुंचा। सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण से असहमति जताई और यह दोहराया कि केवल पदनाम के आधार पर किसी कर्मचारी को supervisory या managerial नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने Dominant Nature Test को लागू करते हुए कहा कि यह देखा जाना चाहिए कि कर्मचारी का मुख्य और वास्तविक कार्य क्या है। यदि किसी व्यक्ति का प्रमुख कार्य शारीरिक, तकनीकी या लिपिकीय प्रकृति का है, तो वह “कामगार” माना जाएगा, भले ही उसके पदनाम में supervisory शब्द क्यों न जुड़ा हो।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल कुछ सीमित supervisory जिम्मेदारियां या Seniors को रिपोर्ट करना, किसी कर्मचारी को supervisory श्रेणी में लाने के लिए पर्याप्त नहीं है। supervisory कर्मचारी वही माना जाएगा जिसके पास वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति, अधीनस्थ कर्मचारियों पर नियंत्रण और अनुशासनात्मक अधिकार हो। इस मामले में यह पाया गया कि अपीलकर्ता के पास ऐसी कोई स्वतंत्र या निर्णायक शक्ति नहीं थी और उसका कार्य मूल रूप से लिपिकीय/कैशियर जैसा ही था।
इन तथ्यों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय का आदेश रद्द कर दिया और श्रम न्यायालय के निर्णय को बहाल कर दिया। परिणामस्वरूप, अपीलकर्ता को “कामगार” माना गया तथा उसे पुनः Back Wages के साथ Appointment देने का निर्णय प्रदान किया।
यह निर्णय श्रम कानून के क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह स्पष्ट रूप से बतलाता है कि नियोक्ता केवल पदनाम बदलकर कर्मचारियों को श्रम कानूनों से वंचित नहीं कर सकते। कर्मचारी की वास्तविक भूमिका, कार्य की प्रकृति और अधिकारों का स्तर ही यह तय करेगा कि वह Industrial Disputes Act के संरक्षण के दायरे में आता है या नहीं। यह फैसला श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक मजबूत न्यायिक कदम के रूप में देखा जाएगा।

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